रविवार, 25 मार्च 2012

चलिए आप को श्रीनगर लिए चलतें हैं-1

    यह साल (२०१२)मेरे लिए और मेरे  खान- दान के लिए बड़ा ही विशेष था.क्योंकि इस वर्ष ही मुझे और मेरी पत्नी को श्रीनगर जाने का मौका मिला.नहीं तो मेरी पिछली तीन पीढ़ियों ने उत्तर प्रदेश से तो क्या अलीगढ से आगे निकल कर नहीं देखा.भाई किस को फुर्सत है खेती-बाड़ी  से?मगर मैंने तो सोच लिया था कि भैया चाहें कुछ भी हो घूमना-घुमाना जरुर करूँगा चाहें थोडा-बहुत कम बचत करनी पड़े.क्योंकि ज़नाब गाफिल ने क्या खूब कहा है-"सैर कर दुनिया कि गाफिल जिंदगानी फिर कहाँ / जिंदगानी  गर रही तो नौ-जवानी फिर कहाँ?"
 जैसा कि मैंने कहा कि यह साल मेरे  लिए बड़ा ही विशेष रहा,कई रिकॉर्ड टूटे मेरे खान दान के -
पहला रिकॉर्ड -मै और मेरे  परिवार ने एयर-इंडिया से हवाई यात्रा की.आज कल अगर कोई आम आदमी एयर-इंडिया से हवाई यात्रा कर ले ये ही अपने आप में रिकॉर्ड बन जाता है.हांलांकि सरकारी अफसरों की बीबियाँ अपने पति के ऊपर जबरदस्ती दबाव डाल कर उनका और अपने परिवार का रिजर्वेसन एयर-इंडिया में ही करवातीं हैं क्यों कि उनको लगता है कि एयर इंडिया की यात्रा उन के पति के लिए सुरक्षित है.क्यों कि एयर इंडिया कि एयर होस्टेस अधेड़, साड़ी-शुदा और शादी-शुदा होती हैं.जिस से उन के पति खुद ही  तांक-झांक नहीं करतें हैं.अन्यथा किंगफिशर  जैसी एयर-लाइंस में तो साधू-संत भी चक्षु-शेकन करना आरम्भ कर देतें हैं.आम आदमी तो फिर भी अबला नारी का शिकारी होता ही  है.
     और फिर एयर इंडिया में सफ़र करना इतना महंगा है कि आम आदमी तो अपनी बीबी को समझा लेता है कि -"तुम ऐसा करो प्रिये! कि एक किलो चावल-दाल मिक्स कर लो.मैं फ्लाईट मैं दोनों को अलग करता रहूँगा.इस से पैसे भी बच जायेंगे और मैं उन किंगफिशर की अप्सराओं की ओर मेरा ध्यान भी नहीं जायेगा."


        दूसरा रिकॉर्ड यह टुटा कि मैं उस उत्तर प्रदेश कि सीमा से बाहर निकला,जिस उत्तर प्रदेश मैं हाथी भी मूर्ति बन के चुप-चाप पार्कों में खड़ा रहता है.सरकारी उच्चा अधिकारी भी बहन जी के सामने दम हिलाते नज़र आतें हैं .तो बेचारा आम आदमी क्या करेगा?जिस उत्तर प्रदेश में दलितों को मात्र वोट-बैंक की दृष्टि से ही देखा जाता है.जिन्हें जीवन पर्यंत दलित जीवन की सीमाओं में बंधे रहने के लिए अप्रत्यक्ष रूप से बाधित किया जाता है.क्यों कि चाहें वे कितने भी बड़े बन जाएँ,मगर politician  अपने फायदे के लिए उन्हें दलित ही बना कर रखतें हैं .फिर क्या फर्क पड़ता है कि आप कि आर्थिक स्थिति कितनी सुद्रढ़ है जब तक कि आप को दलित ही कहा जा रहा है.दलित शब्द का अर्थ है-"प्रताड़ित/पीडित/शोषित".मगर क्या कोई व्यक्ति तब भी शोषित रहता है जब वह उच्च सरकारी सेवाओं पर नियुक्त हो जाता है.जहाँ उसे अपनी सात पीढ़ियों तक को पालने पैसा मिल जाता है.मगर वह भी अपने बच्चों को दलित कहलवाना ही पसंद करता है -चंद आरक्षण सम्बन्धी लाभों के लिए.जिस अभिशाप से बचाने के लिए संविधान में दलित-भलाई कार्यक्रमों का प्रावधान गुनी-जनों ने किया था वे सब निरर्थक ही सिद्ध होतें है क्यों कि आज तक दलित का बेटा या उसके बेटे का बेटा दलित ही रहा है.उस का ओहदा बढ़ सकता है ,उस कि आर्थिक स्थिति मजबूत हो सकती है मगर उस कि सामाजिक स्थिति मैं कोई बदलाब नहीं आता.वह अपनी आगामी पीढ़ियों को भी जन्मजात  दलित घोषित कर देता है.क्यों कि  दलित बने रहेंगे तो ही आरक्षण भी मिलाता रहेगा.फिर कोई क्यों अपनी स्थिति में सुधार लाये.
                       मैंने उस उत्तर प्रदेश की सीमायें पार की जिस की सीमाएं सिर्फ बाहरी प्रदेशों में काम पानें और अपना पेट भरने के लिए ही पार की जाती हैं .ना कि घुमक्कड़ी का शौक पूरा करने के लिए.जहाँ के लोग आज भी पुलिस थाने में रिपोर्ट दर्ज करने के ५०० रुपये देतें हैं.जहाँ कि पुलिस पैसे ले कर भी ,कब ताकतवर पार्टी के साथ मिल जाये कोई भरोसा नहीं,जहाँ गरीबों के लिए आने वाला मिटटी का तेल भी उन के घरों को फूंकने के काम में लिया जाता है.जहाँ की शासन व्यवस्था को आज तक कोई चाणक्य नहीं मिला,न कोई चन्द्रगुप्त.जो भी शासक बना उसने सिर्फ अपनी और अपनी जाति कि भलाई के बारे में ही सोचा.किसी ने अपने गाँव के लिए रन-वे बनवा दिया तो किसी ने हेली-पैड.किसी ने हाथी की मूर्ति लगवा दी तो किसी ने गधे की.समझ नहीं आता कि इन के पास इन हाथियों-गधों से मिलने कि फुर्सत खूब मिलती हैं मगर इंसानों  कि याद सिर्फ चुनाव से पहले ही आती है.
               मजाक-मजाक में बहुत भंडास निकाल ली ,क्या करें  इन राज नेताओं ने अपने विशेष* कर्मों से लेखकों को इतना मसाला प्रदान कर दिया कि जितना भी गरियाओ,न तो मसाला ख़त्म होता है न भंडास.खैर मैंने श्रीनगर जाने के लिए लिए लगभग दो महीने पहले से तयारी शुरू कर दी थी.होटल्स कि तलाश ओन लाइन कि तो ससुरा सब से सस्ता होटल मिला तो 1455 /- का.अब वहां जाना था तो रहना ही पड़ेगा.इस लिए एक दिन के लिए वाही होटल बुक कर दिया.हांलांकि 6 दिन रहना था मगर होटल एक दिन के लिए बुक किया.यह सोच कर कि हो सकता है कि डैरेक्ट होटल बुक करें तो शायद कुछ रियायत मिल जाये.मगर जब में वहां पहुंचा तो इन ऑन-लाइन होटल बुकिंग की असली पोल खुली.भैया जितने भी टूरिस्ट एरिया के जो होटल वालें  हैं ससुरे बहुत ही चालू पुर्जे वाले हैं.इन का कोई हिसाब- किताब नहीं है.जैसी मुर्गी फंस जाये,वैसा ही बटोर लो.क्यों कि ज्यादा तर तो वहां हनी-मून मनाने ही जातें हैं इसीलिए नई बीबी को  इम्प्रेस करने के चक्कर में ससुरे खूब खर्चा करतें हैं.खूब महंगे होटल में रुकतें हैं .अब एक बात बताइए आप हनी-मून बीबी के साथ मनाएंगे या होटल के साथ.खैर सौ बातों की एक बात कि भैया अगर पैसा मेहनत का हो तो खर्च किया जाता है,और हराम का हो तो उड़ाया जाता है.मालुम नहीं कि मेहनतकश लोग पैसा उड़ाने की बात क्यों करतें हैं.अगर उड़ना ही था तो इतनी मेहनत क्यों?

बुधवार, 1 फ़रवरी 2012

ऑन- लाइन शोपिंग !!! आप ने अभी तक की या ...नहीं

शीर्षक जितना अट-पटा है,उतना ही मजेदार भी है.सच बता रहा हूँ मित्रो .आज से छह -सात महीने पहले मुझे भी किसी  ने इसी तरह से bade ही aashchary से कहा था -ऑन- लाइन शोपिंग !!!  आप ने अभी तक की या ...नहीं ?
फिर मैंने निश्चय कर लिया-की अब तो ऑन- लाइन शोपिंग !!! का पूरा आनंद लेना ही पड़ेगा.और सच में बहुत अच्छा अनुभव रहा-ऑन- लाइन शोपिंग  का.मैंने सब से पहले एक 8  जी बी का पेन ड्राइव का ऑन- लाइन आर्डर किया.bajaar में जिस की कीमत ५५०-६०० तक पद रही थी.मुझे वह मात्र ४५०-४९५ में पड़ा.और फिर जितना ज्यादा में इस ऑन- लाइन शोपिंग की दुनिया में घुसा उतना ही अच्छा अनुभव और मिला-आप भी ऑन- लाइन शोपिंग  का आनंद उठा सकते हैं-नीचे कुछ बातें जो आप को अच्छी लगेंगी -
१-ऑन- लाइन शोपिंग के लिए मेरे हिसाब से निम्न वेब साइट्स पूरी तरह से भरोसे मंद हैं -
 www.homeshop18.com, www.naaptol.com , www.koovs.com, www.flipcart.com, www.snapdeal.com ,www.letsbuy.com इत्यादि ,जिनसे मैंने शोपिंग की है .और बहुत अच्छे प्रोडक्ट प्राप्त हुए.कई बार तो मैंने डेबिट-कार्ड से पहले ही पेमेंट किया है.हांलांकि ये विकल्प मैंने तभी प्रयोग किया जब किसी प्रोडक्ट पर " कैश- ऑन डिलीवरी " विकल्प नहीं था.
२.ज्यादा तर वेब साइट्स कैश ऑन डिलीवरी का विकल्प देती हैं जो सब से बेहतर है.
३. जब आप आर्डर प्लेस कर रहें है तो इस से पहले एक बार अन्य वेब साइट्स पर भी उस वास्तु का दाम जांच लें ,कई बार दूसरी वेब साइट्स पर वही चीज सस्ती मिल  जाती है.तो फिर महंगा क्यों खरीदना ?
४. जब भी आप किसी चीज को लेने/खरीदने की योजना बना रहे हों तो उस से पहले वेब साइट्स को चेक करते रहिये.कभी- कभी कुछ चीजें आप के लोकल मार्केट में भी ऑन लाइन से सस्ती मिल सकतीं हैं.आप ये कभी न भूलें.एसा उन चीजों में ही होता जो ज्यादा तर बिना ब्रांड नाम वाली होतीं हैं.जैसे कपडे इत्यादि.लेकिन गेजेट्स आदि के सही दाम ऑन लाइन मिलने के चांस बहुत ज्यादा होतें हैं.
५. और हाँ ,coupons का लाभ उठाना भी सब से बड़ा मजे दार और फायदे मंद तो है ही.इस के लिए जरुरी नहीं की  सामान्य बाज़ार की तरह आप के पास coupons हो ही .अरे भाई , coupons  भी ऑन लाइन उपलब्ध रहते हैं आज कल.बस सर्च मारिये-गूगल बाबा हैं ना.चलिए एक सब से जबरदस्त वेब साईट का नाम में आप को बता देता हूँ ,जहाँ  सभी शौपिंग साईट के coupons उपलब्ध रहते हैं.और इन coupons से आप २०-३०% तक फायदा अतिरिक्त कर सकतें हैं .मतलब सस्ते पे सस्ता .
६. और हाँ ! वह कोई और जमाना होता होगा ,जब ऑन लाइन वेब साईट से  लैपटॉप के जगह C.D. Player भेज दिए जाते होंगे.जैसा की कुछ लोग सुनी सुने कहतें हैं.भाई आज कल तो हरेक बुद्धिमान ऑन लाइन शौपिंग करना पसंद करेगा.बशर्ते इन्टरनेट की सुविधा उस के पास होनी चाहिए.और आप के पास तो वह पहले से ही है.
तो आप से में पूछता हूँ -ऑन- लाइन शोपिंग !!!  आप ने अभी तक की या ...नहीं ?


सोमवार, 15 अगस्त 2011

क्या आज 15 अगस्त है ?


                आप को  बड़ा अजीब -सा  लग रहा होगा यह सवाल / क्योंकि एक भारतीय से इतनी आशा तो होती ही है कि उसे अपने देश का राष्ट्रीय पर्व स्वतंत्रता दिवस तो याद ही रहेगा! मगर यह सच है -मुझे  याद ही नहीं  कि आज १५ अगस्त है-मेरे देश का स्वतंत्रता दिवस आज है.मुझे तो यह महज़ एक छुट्टी का दिन ही प्रतीत होता है.और शायद इस से ज्यादा मेरे लिए इस का महत्त्व  हो ही नहीं  सकता,क्योंकि न तो मैं एक नेता हूँ ,जो बड़े-बड़े झलसों में भाषण देते हैं.वो  जो आज तक नहीं कर पाए उस की बात करते हैं.सत्ता पक्ष तो विपक्ष की बुराई अगर विपक्ष तो सत्ता पक्ष की बुराई.जब कि दोनों की महानता में चूने  की तथा यूरिया की समानता है जो पानी में मिलाने पर दूध से दिखते ज़रूर है मगर होते दोनों ही जहरीलें  हैं . दोनों पक्षों के नेताओं को अगर नंगा करेंगे तो नेकर भी सा( *)लों ने तिरंगे का बना रखा होगा.इतना चूस चुके हैं वे इस देश ka -खुद लाल हो गए हैं और आम जन-मानस पीलिया से ग्रस्त  .अभी तक खुद की मक्कारी की आदत बदल नहीं पाए लेकिन देश की तश्वीर बदलने की बात करतें हैं.हाँ ! मैं यह भी जनता हूँ की वो तश्वीर तो बदलने की बात करतें है मगर उस  तश्वीर में लाखों दीवारें खड़ी  कर के उस नक्शा को बदलने के अलावा उनकी कोई और योजना हो ही नहीं सकती.
                         न मैं कोई अभिनेता हूँ जिसे टी.वी. पर दर्शकों को  स्वतंत्रता दिवस की बधाई-सन्देश दिलवाने के लिए बुलवाया गया हो.ये  वो लोग  हैं जिन्हें अगर ठीक-ठाक सा पैसा  मिले  तो ज़हर  को  भी  बेस्ट -ड्रिंक (ठंडा होना है तो जहर  लाना /पहले इस्तेमाल करो फिर मरो ) बोल  कर  उसका   विज्ञापन   कर  सकते   हैं.इन्हें  कोई मतलब  नहीं कि- चाहें  उसे  पीकर उसके प्रशंसक  मरतें  हैं या  नहीं बचतें  हैं .उसे  तो बस  रुपयों  से मोहब्बत है.
                न मैं कोई खिलाडी  हूँ जिसे  इस अवसर  पर  भारत  सरकार  के द्वारा  कोई सम्मान दिया जाना  हो.जो  खेलने  के लिए कम  सालाना  बिजिनेस   के लिए ज्यादा दिया जा रहा है .पहले एक कहावत हुआ कराती थी कि-" पढोगे-लिखोगे बनोगे गंवार ,खेलोगे-कूदोगे बनोगे नवाब /"जब मैं पढाई करता था तब मुझे यह बात समझ नहीं आती थी.आज जब खिलाडियों को करोड़ पति बनते हुए देखता हूँ तो वह कहावत सच होती नज़र आती है ,कहाँ उस वक़्त हम पैसे के लिए जी तोड़ कर पढाई करते थे कि किसी तरह से I.A.S. में सेलेक्शन हो जाये तो पैसे कि कोई कमी शायद नहीं रहेगी .मगर हाय री महंगाई तूने I.A.S. जैसे ओहदे पर बैठे लोगों को रिश्वत लेने पर मजबूर कर दिया.क्यों कि इस सरकारी इनकम से तो स्टेटस मेंटेन नहीं होता ना .इसी लिए ओवर इनकम कि जरुरत आन पड़ती है .और इस के लिए फिर इतनी मेहनत इन बेचारों को करनी पड़ती है -कभी यहाँ छापा मार कहीं वहां छापा मार.मगर धन्य हो आप भगवान् थोड़ी महनत करने पर इन को मुर्गे मिल ही जातें हैं जो बेचारे इस नेट्वर्किंग सिस्टम को चलाने में  अपना सहयोग देते हैं.वे भी नीचे वालों से और आम जनता से रिश्वत लेतें हैं और ऊपर वालों को देतें है ,बेचारे गरीब अधिकारी  थोड़े से कमीशन के लिए कमीने बन जातें हैं .
               मैं तो वो सरकारी अफसर भी नहीं हूँ- जो लाख कमीनापन करे मगर फिर भी १५ अगस्त पर अपने नीचे वालों को गाँधी और भगत सिंह जैसा बनने के लिए प्रेरित करता है .फिर उन महान देश भक्तों की पवित्र मूर्तियों पर फूल-माला चढ़ाता है .और आत्म संतुष्ट हो जाता है कि कम से कम खुद सम्मान के योग्य नहीं है तो क्या हुआ कम से कम महान आत्माओं को तो सम्मान दे ने का कम उसे दिया उस ऊपर वाले ने .
           मैं तो वो सरकारी कर्मचारी भी नहीं हूँ जो बेचारा अफसरशाही का शिकार तो है मगर फिर भी उसे आज कम से कम छुट्टी तो मिलेगी ही ,आज की तनख्वा भी नहीं कटेगी.मिठाई का डिब्बा भी मिल जायेगा .जो अक्सर यही कह कर अपनी सफाई देतें हैं कि इस देश में  वाही  सत्य  वादी  है जिस  को मौका  नहीं मिलाता  .शायद एक  हद  तक  सही   कहतें  हैं.

         भाई ! मैं तो आम आदमी  हूँ जो पूरे  दिन जी -तोड़ मेहनत -मजदूरी करने के बाद भी सिर्फ १५०-२०० रुपये कमा  पाता है .जिसे हर दिन का कमाना-खाना है.  जिस  की आज  की रोज़ी-रोटी छिन गई -  क्यों?...  क्यों  की आज  15 अगस्त  है .सब काम बंद है / हर दफ्तर  बंद है.किस ख़ुशी में ..? क्यों की आज  स्वतंत्रता दिवस है / अरे! तुम सब तो पार्टियों में खाना खा कर मजे  से सो जाओगे.मगर क्या होगा मेरा और मेरे परिवार का . मेरे बच्चे तो आज फिर पोहा खा कर  ही  गुज़ारा  करेंगे  ना ?स्वतंत्रता दिवस तो तुम्हारे लिए है ना मैं तो अभी तक पर-तंत्र  ही हूँ ना  .मैं तो अभी तक गरीबी और भुखमरी से जूझ  रहा हूँ .मैं तो अब तक बिना छत के घर में रहता हूँ जहाँ हर मौसम-हर रुत  अपना विकृत रूप दिखाती है .मुझे कोई  मौसम अच्छा नहीं लगता.क्योंकि हर मौसम मेरे लिए परेशानी ही लाता है .

आज हम -सब परिवारी-जन भूखों पेट रह कर "जन-गन-मन" गायेंगे .ये ऊपर के सब लोग तो खा-पी कर १५ अगस्त मना रहे हैं मगर में और परिवार देश का स्वतंत्रता दिवस भूखा रह कर मना रहा है.आज जब कि सरकार के खाद्यान्न भंडारों में हजारों टन गेंहूँ सड़ रहा है.उसे चूहे और दीमक खा रहें हैं मगर किसी गरीब के परिवारीजन भूंखे सो रहें हैं क्या वो  खाद्यान्न भण्डार किसी के बाप के हैं ,क्या किसी आम भारतीय का उन पर कोई हक नहीं है?तो फिर काहे  का लोक तंत्र इस से अच्छा तो अंग्रेजी शासन  ही ठीक था कम-से-कम तसल्ली तो थी कि हम गुलाम हैं.
         मगर आज जब हमारी आज़ादी को 64 साल गुज़र चुके हैं ,हालात में कोई खास सुधार नहीं हुए हैं .आज भी हम बुनियादी ज़रूरतों के लिए संघर्ष कर रहे हैं.अंग्रेज तो चले गए मगर आज भी हम गुलाम हैं उनकी अंग्रेजी विचारधारा के,उन की भाषा के,उन के पहनावे के और तो उन की संस्कृति के.आज भी हम हमारे हमारे गरीब भाइयों (जैसे सब्जी वाला ,मोची,चपरासी,या अपना सब-ऑर्डिनेट) के सामने अपना रुतवा दिखाने के लिए उन्हीं पुरानी अंग्रेजी पद्धतियों का उपयोग करते हैं.आज भी हम डरे हुए- सहमे  हुए से  रहते हैं .आज भी सुरक्षा के नाम पर सिर्फ एक औपचारिकता ही हो रही है .पुलिस भी उन की नहीं सुनती जो सच में शोषित हैं और गरीब हैं.और कुल मिला कर अगर कहा जाये -आम आदमी नहीं जानता है कि वह वास्तव में आजाद  है ?
         क्योंकि सच्चे अर्थों में आजादी तभी होगी  जब जन-जन कि मूलभूत आवश्यकताओं की आपूर्ति संभव हो जाएगी .और सच कहूँ तो आज आम आदमी दूर-दूर तक कोई आसार नज़र नहीं आ रहे कि ऐसा कुछ होने वाला है .
      तो आप ही बताइए  कि क्या  आज 15 अगस्त है - स्वतंत्रता दिवस ?

शनिवार, 13 अगस्त 2011

हम भारत के सैनिक हैं- वायु सैनिक

वायु -सैनिक नाम अपना ,
राष्ट्र -रक्षा धर्म अपना .

वायु में जब भी उड़े हैं-
नभ की छाती चीर दी है -
बच के रहना दुश्मनों ! तुम,
अपनी नज़रें तीर -सी हैं.

यान का ध्वनि-नाद सुन कर ,
गूँज उठती हैं दिशाएँ ,
थर-थरातीं  हैं जमीं-
नाच उठातीं हैं कलाएँ











शांति के युग दूत हम हैं ,
युद्ध में यम दूत हम हैं.
जोश का शैलाव  हम हैं
मत छुओ एक आग हम हैं.


है कसम माँ  भारती की,
युद्ध से डरते नहीं हम.
जो भी हम को छेड़ता है-
छोड़ते उस को नहीं हम.


है हमारा एक सपना  ,
देश हो सर्वग्र अपना .
वायु सैनिक नाम अपना,
राष्ट्र रक्षा धर्म अपना.



स्वतंत्रता दिवस की ढेरों शुभ-कामनाएँ -
                     एक हिन्दुस्तानी को-एक हिन्दुस्तानी की ओर से

गुरुवार, 11 अगस्त 2011

आज ख़ुशी के गीत भला में गाऊं कैसे?

आज ख़ुशी के गीत भला में गाऊं कैसे?
आज ह्रदय के रंग तुम्हें दिखलाऊं  कैसे ?

भ्रमर पूंछते हैं मुझ से गाते हो क्यों कर?
क्या कोई मिला है ,आज तुम्हें पुष्पों से सुन्दर ?
मैं वह सुंदर पुष्प तुम्हें दिखलाऊं कैसे?
आज ख़ुशी के गीत भला में गाऊं कैसे?

हवा पूंछती है मुझसे रुक-रुक चल कर-
कौन गंध आनंद ले रहे तुम छुप -छुपकर?
प्रेम गंध का मैं वर्णन कर पाऊं कैसे?
आज ख़ुशी के गीत भला में गाऊं कैसे?

आज पुष्प उपवन के मुझ से हँस-हँस पूंछे ,
क्यों ये कंधे उठे हुए है-इतने ऊंचे?
मैं इन प्रश्नों के उत्तर ,दे पाऊं कैसे?
आज ख़ुशी के गीत भला में गाऊं कैसे?

जय शंकर की श्रृद्धा मुझ से पूंछे चिढ़कर ,
क्या कोई मिली  है, हे कवि! तुम को मुझ से सुंदर?
मैं उस रचना पर रचना कर पाऊं कैसे?
आज ख़ुशी के गीत भला में गाऊं कैसे?

आज ख़ुशी के गीत भला में गाऊं कैसे?
आज ह्रदय के रंग तुम्हें दिखलाऊं  कैसे ?




मंगलवार, 9 अगस्त 2011

आज मेरी शादी है

 सुनो   हमारी  बात  ,ध्यान  से  मेरे  साथी!


मैं दुल्हा , वो  दुल्हन  होगी ,


और  बनोगे  तुम बाराती ..


नाच -नाच कर  धूम  मचाना ,


धूम मचा  कर ,रंग  ज़माना ,


आशा  है  की  तुम  आओगे ,


गीत  ख़ुशी  के  तुम गाओगे ,


मैं  खुस  हूँ  ,क्या  तुम्हें  बताऊँ ,


मुझे  मिला  है एसा   साथी ,


वह  मेरा  ख्वाबों  का  साथी,


प्यारा  मेरा जीवन -साथी.

रविवार, 24 जुलाई 2011

तुम दूर गए ,क्या भूल गए...?

तुम मेरे हमेशा  करीब हो -
मेरी यादों में ,
मेरे ख्वाबों में ,
मेरे अहसासों में ,
मेरी आशाओं के सुन्दर से संसार में .

"किसी से बात करने पर 
अक्सर  तुम्हारा  नाम क्यों आता है ?
मेरे मुंह पर "

"कितना चाहा है तुम्हें ? "
यह सिद्ध  करना 
ज़रूरी तो नहीं 
मगर, हाँ !
मुश्किल ज़रूर है 
शब्दों में व्यक्त कर पाना 
मेरे लिए संभव ही नहीं /

किन्तु विवश हूँ...
शायद बहुत मुश्किल है -
दिल की बातों  को दिल में रख पाना //
मगर.....
कहूँ तो किस से कहूँ - 
कि  तुम मेरे अब भी करीब हो /

वो कालेज के दिन ,
वो फ़िल्मी बातें ,
वो मुझ से किये गए वादे,
........तुम्हें याद भी है....?
...या फिर ...
शायद भूल भी गए होंगे 
सब पुरानी बातें /
कहीं खो गयी होंगी -
परदेश कि चमक में /


"एक दिन बहुत बड़ा बनूँगा मैं /"
तुम अक्सर कहते थे /
हमेशा कैरियर कि बातें करना ,
और 
स्वप्निल उड़ानें भरना /


मिलने आना-
और तोहफा न लाना /
और कहना -"उधार रहा /"
और धीरे  से मुस्करा देना / 


ये सब सोचना
मुझे अहसास  दिलाता  है  कि- 
तुम मेरे करीब हो /




आज तुम दूर बहुत दूर ...
अपने  सपनों के संसार में -
प्रसिद्धि कि बुलंदियों पर -
किसी गोरी मेम  के साथ ,
भुला कर इतने वर्षों बाद ,
प्यार की वह पहली सौगात ,
उधार के मेरे तोहफे सात -
बताओ कब दे देंगे आप?
बताओ कब दे देंगे आप?

और मैं इतने वर्षों बाद -
आज भी तकूँ  आप की राह-

बड़ा सा  प्यारा सुन्दर यान 
देख  पीपल के ऊपर ,
मन को ख़ुशी हुई अनजान -
कि  आते होंगे मेरे श्याम /
कि  आते होंगे मेरे श्याम /

किन्तु ...
सपनों के पैर ही कहाँ होते हैं -
सिर्फ पंख होते हैं /
और धडाम से गिर कर टूट जातें  हैं-
"सच " के रन -वे पर 
-लैंड करने से पहले ही /
और एक बार फिर अधूरी रह  जाती-
मेरी कविता/


मगर जब भी पन्ने पलटती हूँ -तो
एक बार फिर हंस लेती हूँ -
स्वयं  ही स्वयं पर //


ये मेरी अंतहीन कवितायेँ ...
अक्सर ये अहसास दिलातीं हैं कि-
किसी बहाने ही सही -
तुम आज भी मेरे बहुत करीब हो
सच ... तुम आज भी मेरे करीब हो //




दुष्ट व्यक्ति यदि आपको सम्मान भी दे तो सावधान

समाज में दो प्रकार के मनुष्य सदा से ही पाए जाते रहें हैं – सज्जन और असज्जन | अलग अलग युगों में हम उन्हें विभिन्न नामों से पुकारते रहें ...