शनिवार, 13 अगस्त 2011

हम भारत के सैनिक हैं- वायु सैनिक

वायु -सैनिक नाम अपना ,
राष्ट्र -रक्षा धर्म अपना .

वायु में जब भी उड़े हैं-
नभ की छाती चीर दी है -
बच के रहना दुश्मनों ! तुम,
अपनी नज़रें तीर -सी हैं.

यान का ध्वनि-नाद सुन कर ,
गूँज उठती हैं दिशाएँ ,
थर-थरातीं  हैं जमीं-
नाच उठातीं हैं कलाएँ











शांति के युग दूत हम हैं ,
युद्ध में यम दूत हम हैं.
जोश का शैलाव  हम हैं
मत छुओ एक आग हम हैं.


है कसम माँ  भारती की,
युद्ध से डरते नहीं हम.
जो भी हम को छेड़ता है-
छोड़ते उस को नहीं हम.


है हमारा एक सपना  ,
देश हो सर्वग्र अपना .
वायु सैनिक नाम अपना,
राष्ट्र रक्षा धर्म अपना.



स्वतंत्रता दिवस की ढेरों शुभ-कामनाएँ -
                     एक हिन्दुस्तानी को-एक हिन्दुस्तानी की ओर से

गुरुवार, 11 अगस्त 2011

आज ख़ुशी के गीत भला में गाऊं कैसे?

आज ख़ुशी के गीत भला में गाऊं कैसे?
आज ह्रदय के रंग तुम्हें दिखलाऊं  कैसे ?

भ्रमर पूंछते हैं मुझ से गाते हो क्यों कर?
क्या कोई मिला है ,आज तुम्हें पुष्पों से सुन्दर ?
मैं वह सुंदर पुष्प तुम्हें दिखलाऊं कैसे?
आज ख़ुशी के गीत भला में गाऊं कैसे?

हवा पूंछती है मुझसे रुक-रुक चल कर-
कौन गंध आनंद ले रहे तुम छुप -छुपकर?
प्रेम गंध का मैं वर्णन कर पाऊं कैसे?
आज ख़ुशी के गीत भला में गाऊं कैसे?

आज पुष्प उपवन के मुझ से हँस-हँस पूंछे ,
क्यों ये कंधे उठे हुए है-इतने ऊंचे?
मैं इन प्रश्नों के उत्तर ,दे पाऊं कैसे?
आज ख़ुशी के गीत भला में गाऊं कैसे?

जय शंकर की श्रृद्धा मुझ से पूंछे चिढ़कर ,
क्या कोई मिली  है, हे कवि! तुम को मुझ से सुंदर?
मैं उस रचना पर रचना कर पाऊं कैसे?
आज ख़ुशी के गीत भला में गाऊं कैसे?

आज ख़ुशी के गीत भला में गाऊं कैसे?
आज ह्रदय के रंग तुम्हें दिखलाऊं  कैसे ?




मंगलवार, 9 अगस्त 2011

आज मेरी शादी है

 सुनो   हमारी  बात  ,ध्यान  से  मेरे  साथी!


मैं दुल्हा , वो  दुल्हन  होगी ,


और  बनोगे  तुम बाराती ..


नाच -नाच कर  धूम  मचाना ,


धूम मचा  कर ,रंग  ज़माना ,


आशा  है  की  तुम  आओगे ,


गीत  ख़ुशी  के  तुम गाओगे ,


मैं  खुस  हूँ  ,क्या  तुम्हें  बताऊँ ,


मुझे  मिला  है एसा   साथी ,


वह  मेरा  ख्वाबों  का  साथी,


प्यारा  मेरा जीवन -साथी.

रविवार, 24 जुलाई 2011

तुम दूर गए ,क्या भूल गए...?

तुम मेरे हमेशा  करीब हो -
मेरी यादों में ,
मेरे ख्वाबों में ,
मेरे अहसासों में ,
मेरी आशाओं के सुन्दर से संसार में .

"किसी से बात करने पर 
अक्सर  तुम्हारा  नाम क्यों आता है ?
मेरे मुंह पर "

"कितना चाहा है तुम्हें ? "
यह सिद्ध  करना 
ज़रूरी तो नहीं 
मगर, हाँ !
मुश्किल ज़रूर है 
शब्दों में व्यक्त कर पाना 
मेरे लिए संभव ही नहीं /

किन्तु विवश हूँ...
शायद बहुत मुश्किल है -
दिल की बातों  को दिल में रख पाना //
मगर.....
कहूँ तो किस से कहूँ - 
कि  तुम मेरे अब भी करीब हो /

वो कालेज के दिन ,
वो फ़िल्मी बातें ,
वो मुझ से किये गए वादे,
........तुम्हें याद भी है....?
...या फिर ...
शायद भूल भी गए होंगे 
सब पुरानी बातें /
कहीं खो गयी होंगी -
परदेश कि चमक में /


"एक दिन बहुत बड़ा बनूँगा मैं /"
तुम अक्सर कहते थे /
हमेशा कैरियर कि बातें करना ,
और 
स्वप्निल उड़ानें भरना /


मिलने आना-
और तोहफा न लाना /
और कहना -"उधार रहा /"
और धीरे  से मुस्करा देना / 


ये सब सोचना
मुझे अहसास  दिलाता  है  कि- 
तुम मेरे करीब हो /




आज तुम दूर बहुत दूर ...
अपने  सपनों के संसार में -
प्रसिद्धि कि बुलंदियों पर -
किसी गोरी मेम  के साथ ,
भुला कर इतने वर्षों बाद ,
प्यार की वह पहली सौगात ,
उधार के मेरे तोहफे सात -
बताओ कब दे देंगे आप?
बताओ कब दे देंगे आप?

और मैं इतने वर्षों बाद -
आज भी तकूँ  आप की राह-

बड़ा सा  प्यारा सुन्दर यान 
देख  पीपल के ऊपर ,
मन को ख़ुशी हुई अनजान -
कि  आते होंगे मेरे श्याम /
कि  आते होंगे मेरे श्याम /

किन्तु ...
सपनों के पैर ही कहाँ होते हैं -
सिर्फ पंख होते हैं /
और धडाम से गिर कर टूट जातें  हैं-
"सच " के रन -वे पर 
-लैंड करने से पहले ही /
और एक बार फिर अधूरी रह  जाती-
मेरी कविता/


मगर जब भी पन्ने पलटती हूँ -तो
एक बार फिर हंस लेती हूँ -
स्वयं  ही स्वयं पर //


ये मेरी अंतहीन कवितायेँ ...
अक्सर ये अहसास दिलातीं हैं कि-
किसी बहाने ही सही -
तुम आज भी मेरे बहुत करीब हो
सच ... तुम आज भी मेरे करीब हो //




रविवार, 3 जुलाई 2011

कभी हम जी नहीं पाए ....

बहुत मौके मिले थे ,


जिंदगी जीने के मगर .....


कभी हम व्यस्त थे हदतन,


कभी.. हम जी नहीं पाए .










रिश्तों की दरारों को ;


बहुत बढ़ते मैंने देखा...


कभी समझा न सके हम,तो  


कभी खुद समझ ना पाए.






बहुत सोचा - बयां कर दें


सभी बातें मेरे दिल की ...


कभी दिल कह नहीं पाया ,तो


कभी वो सुन नहीं पाए.






बहुत थी खूबियाँ मुझ में ,


उन्हें पहचानता भी था ;


कभी मौका ना मिला तो;


कभी हम दे नहीं पाए .






कल की योजना में ही,


हमेशा आज को खोया ...


उसी कल की फ़िक्र  में -


आज तक हम सो नहीं पाए.






जीवन को समझना ही ,


है शायद लक्ष्य जीवन का ..


कभी कोशिश नहीं की हम ने ,


कभी हम हम जान ना पाए.


                                                                 (जारी.......)





गुरुवार, 5 मई 2011

एकादशी व्रत का विज्ञान


       अधिकांशतः लोगों को यह तो मालूम है की  उपवासों का वैज्ञानिक महत्त्व   हैं  . वे लोग  ऐसा कहते   हैं की सप्ताह में करने  से स्वास्थ्य  अच्छा  रहता  है .लेकिन  जब  किसी  एक  विशेष  दिन  या तिथि   की बात आती  है तो वहा  सिर्फ  आध्यात्मिक कारणों को वे उस से जोड़ देतें हैं,सनातन धर्म में कोई भी बात अवैज्ञानिक तरीके से नहीं कही गयी है यह पूर्ण वैज्ञानिक धर्मिक पद्धति है .
वास्तव  में हमारे दुःख  का कारण हमारी  भावनात्मक  असंतुलन  है,इस असंतुलन का कारन हमारे शारीर  में उपस्थित जल है. चन्द्रमा  के  आकर्षण बल के कारण जल में तरंगों  का जन्म होता है .यदि ऐसा न हो  ,या हो तो कम हो  तो व्यक्ति  अपना आध्यात्मिक या भौतिक  विकास कर सकता है.
       एकादशी के दिन अन्न न खाने  का या उपवास   करने के कारण हमारे शरीर में जल का स्तर काफी  नीचे आ जाता  है , जैसा की  हम जानते हैं की पूर्णिमा को और  अमावस्या को चन्द्रमा का आकर्षण  बल सब  से अधिक  होता है.हमारे शरीर में जल का स्तर नीच हो जाने के कारण   इस आकर्षण बल का प्रभाव नगण्य हो जाता है . व्यक्ति का भावनात्मक असंतुलन का  खतरा नहीं रह  जाता है.


आप अन्य ब्लोग्स भी इस सम्बन्ध में देख सकतें हैं -
जैसे-http://scienceofhinduism.blogspot.com/2008/08/why-do-we-fast-on-ekadesi-days.html       

रविवार, 3 जनवरी 2010

प्रसून

पुष्प को देखा सभी ने ,
उसकी कोमलता को देखा,
 लालची मनुष्य ने तो -
 उस कि सुन्दरता को देखा।

 कामना से ग्रस्त ने ,
अपने मद में मस्त ने ,
यह न देखा - झेलता तूफान है,
 शिशिर में भी झूमता है.
 प्रीति-मधु से झूम कर वह - 
कंटकों को चूमता है।

 देखिये संघर्ष रत है -
 विश्व सारा सो रहा है। 
 ज्यों किरण ने हाथ फेरा,
 पुष्प ने भी आँख खोली ,
 माली ने ले कर के झोली-
 हाथ ज्यों ही बढाया तोड़ने को.
पुष्प सिहरा एक पल को , 
फिर मुस्कुराया- 
सोचा - "मेरा तो जन्म ही उपकार को है,। "
 कर समर्पित स्वयं को
 परकाज़ हित में-
 था प्रसन्न ,
वह प्रसून।

दुष्ट व्यक्ति यदि आपको सम्मान भी दे तो सावधान

समाज में दो प्रकार के मनुष्य सदा से ही पाए जाते रहें हैं – सज्जन और असज्जन | अलग अलग युगों में हम उन्हें विभिन्न नामों से पुकारते रहें ...