
न मैं कोई अभिनेता हूँ जिसे टी.वी. पर दर्शकों को स्वतंत्रता दिवस की बधाई-सन्देश दिलवाने के लिए बुलवाया गया हो.ये वो लोग हैं जिन्हें अगर ठीक-ठाक सा पैसा मिले तो ज़हर को भी बेस्ट -ड्रिंक (ठंडा होना है तो जहर लाना /पहले इस्तेमाल करो फिर मरो ) बोल कर उसका विज्ञापन कर सकते हैं.इन्हें कोई मतलब नहीं कि- चाहें उसे पीकर उसके प्रशंसक मरतें हैं या नहीं बचतें हैं .उसे तो बस रुपयों से मोहब्बत है.
न मैं कोई खिलाडी हूँ जिसे इस अवसर पर भारत सरकार के द्वारा कोई सम्मान दिया जाना हो.जो खेलने के लिए कम सालाना बिजिनेस के लिए ज्यादा दिया जा रहा है .पहले एक कहावत हुआ कराती थी कि-" पढोगे-लिखोगे बनोगे गंवार ,खेलोगे-कूदोगे बनोगे नवाब /"जब मैं पढाई करता था तब मुझे यह बात समझ नहीं आती थी.आज जब खिलाडियों को करोड़ पति बनते हुए देखता हूँ तो वह कहावत सच होती नज़र आती है ,कहाँ उस वक़्त हम पैसे के लिए जी तोड़ कर पढाई करते थे कि किसी तरह से I.A.S. में सेलेक्शन हो जाये तो पैसे कि कोई कमी शायद नहीं रहेगी .मगर हाय री महंगाई तूने I.A.S. जैसे ओहदे पर बैठे लोगों को रिश्वत लेने पर मजबूर कर दिया.क्यों कि इस सरकारी इनकम से तो स्टेटस मेंटेन नहीं होता ना .इसी लिए ओवर इनकम कि जरुरत आन पड़ती है .और इस के लिए फिर इतनी मेहनत इन बेचारों को करनी पड़ती है -कभी यहाँ छापा मार कहीं वहां छापा मार.मगर धन्य हो आप भगवान् थोड़ी महनत करने पर इन को मुर्गे मिल ही जातें हैं जो बेचारे इस नेट्वर्किंग सिस्टम को चलाने में अपना सहयोग देते हैं.वे भी नीचे वालों से और आम जनता से रिश्वत लेतें हैं और ऊपर वालों को देतें है ,बेचारे गरीब अधिकारी थोड़े से कमीशन के लिए कमीने बन जातें हैं .
मैं तो वो सरकारी अफसर भी नहीं हूँ- जो लाख कमीनापन करे मगर फिर भी १५ अगस्त पर अपने नीचे वालों को गाँधी और भगत सिंह जैसा बनने के लिए प्रेरित करता है .फिर उन महान देश भक्तों की पवित्र मूर्तियों पर फूल-माला चढ़ाता है .और आत्म संतुष्ट हो जाता है कि कम से कम खुद सम्मान के योग्य नहीं है तो क्या हुआ कम से कम महान आत्माओं को तो सम्मान दे ने का कम उसे दिया उस ऊपर वाले ने .
मैं तो वो सरकारी कर्मचारी भी नहीं हूँ जो बेचारा अफसरशाही का शिकार तो है मगर फिर भी उसे आज कम से कम छुट्टी तो मिलेगी ही ,आज की तनख्वा भी नहीं कटेगी.मिठाई का डिब्बा भी मिल जायेगा .जो अक्सर यही कह कर अपनी सफाई देतें हैं कि इस देश में वाही सत्य वादी है जिस को मौका नहीं मिलाता .शायद एक हद तक सही कहतें हैं.

आज हम -सब परिवारी-जन भूखों पेट रह कर "जन-गन-मन" गायेंगे .ये ऊपर के सब लोग तो खा-पी कर १५ अगस्त मना रहे हैं मगर में और परिवार देश का स्वतंत्रता दिवस भूखा रह कर मना रहा है.आज जब कि सरकार के खाद्यान्न भंडारों में हजारों टन गेंहूँ सड़ रहा है.उसे चूहे और दीमक खा रहें हैं मगर किसी गरीब के परिवारीजन भूंखे सो रहें हैं क्या वो खाद्यान्न भण्डार किसी के बाप के हैं ,क्या किसी आम भारतीय का उन पर कोई हक नहीं है?तो फिर काहे का लोक तंत्र इस से अच्छा तो अंग्रेजी शासन ही ठीक था कम-से-कम तसल्ली तो थी कि हम गुलाम हैं.
मगर आज जब हमारी आज़ादी को 64 साल गुज़र चुके हैं ,हालात में कोई खास सुधार नहीं हुए हैं .आज भी हम बुनियादी ज़रूरतों के लिए संघर्ष कर रहे हैं.अंग्रेज तो चले गए मगर आज भी हम गुलाम हैं उनकी अंग्रेजी विचारधारा के,उन की भाषा के,उन के पहनावे के और तो उन की संस्कृति के.आज भी हम हमारे हमारे गरीब भाइयों (जैसे सब्जी वाला ,मोची,चपरासी,या अपना सब-ऑर्डिनेट) के सामने अपना रुतवा दिखाने के लिए उन्हीं पुरानी अंग्रेजी पद्धतियों का उपयोग करते हैं.आज भी हम डरे हुए- सहमे हुए से रहते हैं .आज भी सुरक्षा के नाम पर सिर्फ एक औपचारिकता ही हो रही है .पुलिस भी उन की नहीं सुनती जो सच में शोषित हैं और गरीब हैं.और कुल मिला कर अगर कहा जाये -आम आदमी नहीं जानता है कि वह वास्तव में आजाद है ?
क्योंकि सच्चे अर्थों में आजादी तभी होगी जब जन-जन कि मूलभूत आवश्यकताओं की आपूर्ति संभव हो जाएगी .और सच कहूँ तो आज आम आदमी दूर-दूर तक कोई आसार नज़र नहीं आ रहे कि ऐसा कुछ होने वाला है .
तो आप ही बताइए कि क्या आज 15 अगस्त है - स्वतंत्रता दिवस ?