धर्म परिवर्तन ( कहानी)

कहानी
"ये पंडित जी को क्या हो गया ? बुढ़ापे में साठिया गए जो ईसाई धर्म अपना लिया।" मोहल्ले में सब पंडित जी की थू - थू कर  रहे थे। पूरा बामन मोहल्ला पंडितजी के धर्म परिवर्तन को ले कर तरह तरह की बाते बना रहा था । मगर पंडित जी इन सब बातों की कोई फिक्र न थी।
पंडित जी से मेरी मुलाकात सिर्फ साल भर पहले की थी। पिछले साल जनवरी में , मैं जोधपुर तबादले पर आया था । तो सरकारी क्वाटर मिला नही था। जिस वजह से मुझे पंडित जी के घर मे रेंट पर रहना पड़ा। पंडित जी एक  दम शुद्ध शाकाहारी । मुझे आते ही फरमान सुना दिया कि देखो भाई ज्यादा तर फौजी सर्वाहारी होते हैं, मगर जब तक आप लोग इस घर में रहेंगे कुछ भी तामसिक भोजन नही करेंगे। मैं भी ठहरा शुद्ध ब्राह्मण जो लहसुन प्याज भी न छुए। पंडित जी का घर दोमंजिला था । जिसमें से दो कमरे उन्होंने किराये पर उठा दिए थे, बाकी का घर वो ख़ुद और खुद के बच्चों के लिए रखते थे। पंडित जी सरकारी स्कूल मास्टर थे। सो कुछ उनकी पेंशन आ जाती थी ।पिछले साल जब में जोधपुर आया था तब उनके घर पर सिर्फ सात बच्चे थे। मगर पिछले साल में उनके घर मे 16 बच्चे हो गए । जिनका खर्च शायद पेंशन से न चल पाता होगा इस लिए उन्होंने नीचे की अपनी बैठक और खुद का कमरा भी किराये पर उठा दिया। पंडित जी अपने बच्चों के लिए कुछ भी कर सकते थे। ये बच्चे थे ही इतने प्यारे। इन बच्चों में कुछ की उम्र 5-7 वर्ष की और कुछ 3-4 वर्ष के और चार बच्चे 0- 2 वर्ष के थे। इनमे ज्यादातार लड़किया  
थीं। अभी कुछ ही दिन हुए थे उस बात को मुझे अच्छे से याद है मैं ड्यूटी से देर रात लौटा था शायद ग्यारह साढ़े ग्यारह का वक़्त रहा होगा। पंडित जी घर के बाहर ही हाथ मे खून से लथपथ एक नवजात को लेकर खड़े थे । नवजात शिशु गंदे से कपड़े में लिपटा था । मेरी कार को सामने से रोक कर खड़े हो गए ।मैं उस दृश्य को देख के बहुत घबरा गया था। मेरी जगह शायद कोई भी इंसान होता वो भी शायद ऐसा ही रिएक्ट करता । एक पल को तो जैसे मेरे दिमाग ने काम करना ही बंद कर दिया। तभी वे कार में बैठ गए। और तुरंत हॉस्पिटल चलने के लिए बोलने लगे। मैं पास ही के हॉस्पिटल में लेकर गया। वहां डॉक्टरों ने तुरंत उस शिशु का इलाज करना शुरू कर दिया,उसकी हालत बहुत नाजुक थी। पंडित जी  को वो पार्क में उस वक़्त मिली जब  वे सब बच्चो को खाना  खिला कर पार्क में टहलने गए थे। तभी उन्हें उस कन्या शिशु की चीत्कार सुनाई पड़ी, कुछ आवारा कुत्ते उस बच्ची को अपने पंजो से खसोट रहे थे। पंडित जी ने दौड़ कर उस को जैसे तैसे कर कुत्तों से बचाया। कुत्तों के मुँह से उनका नरम नरम भोजन छिनना आसान न था। कुत्तो ने पंडित जी पर हमला कर दिया। बेचारा एक बूढ़ा आदमी कुत्तों का शिकार बन गया। आखिर दो हफ़्तों बाद बच्ची को डिस्चार्ज कर दिया गया । वो अब ठीक थी। पंडित जी भी ठीक हो गए मगर इन 15 दिनों तक वे कितने परेशान रहे कि न उन्होंने ढंग से खाना खाया न ही चैन से सोये। बस पूरे पूरे दिन वे अपने घर के मंदिर में अपने बच्चों के साथ भगवान के सामने बैठ कर  उस बच्ची के लिए प्रार्थना करते रहते। आखिर ईश्वर ने उनकी सुन ही ली।  मगर एक हफ्ते बाद पंडित जी ने घर का मंदिर हटा दिया और घर के बाहर कृष्णा कुटी की जगह क्राइस्ट कॉटेज लिखवा दिया । मुझे पता चला कि उस बच्ची के इलाज में बहुत खर्चा हो गया था। उनके पास इतना पैसा नही था ।कई लोन कंपनियों से कोशिश की मगर शायद पंडित जी उनकी शर्तो को पूरा नही कर सकते थे और न    सब कुछ दाब पर लगा सकते थे वो क्योंकि उन्हें अपने दूसरे सोलह  बच्चों का भी सोचना था और आखिर   उन्होंने खुद का नाम बदल लिया था ।  एक मिशनरी से उन्हें सहायता मिल गई थी। मगर यू ही तो कुछ नही मिलता। इंसान का नाम बदलने से इंसान थोड़े बदल जायेगा। मगर दुनिया को कौन समझाए ।

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