शनिवार, 31 मार्च 2012

चलिए आप को श्रीनगर लिए चलतें हैं-2


ऑन लाइन होटल बुकिंग साईट www .मेरी ट्रिप बनाओ.कॉम से जब बुकिंग की तो ससुरा १५००/-के होटल का दाम लिखा आ रहा था जब पेमेंट करने का टाइम आया तो ४२०/- रुपये सर्विस चार्ज घूंस दिया उस में.जब में श्रीनगर पहुंचा तो वहां जब मैंने होटल की छान-बीन की तो मालूम पड़ा की यहाँ तो ४५०-५०० रुपये में भी बढ़िया होटल उपलब्ध हैं.मैंने सोचा की जितने में एक रात रुक रहें हैं उतने में तो तीन रातों का बन्दों वस्त हो जाता.मगर का करें ,इंटरनेट के कुछ दुरूपयोग भी तो होतें हैं ना.उन में से ये भी है.तभी मेरी आँखें खुलीं की भैया इन्टरनेट सिर्फ ज्ञान का ही नहीं अपितु ज्यादा पैसे कमाने का भी साधन है.क्यों कि जिन होटलों के दाम ४००-५०० रु.थे उन के नाम इन्टरनेट पर नहीं थे.सच कहूँ तो मैं ५०० रुपये में भी संतुष्ट नहीं था मुझे और सस्ता चाहिए था या फिर यौ कहूँ कि जितना सस्ता मिल जाये उतना बढ़िया.मगर इसका मतलब मूलभूत आवश्यकताओं से  समझौता नहीं था.जैसे ही मैं टी.आर .सी.(टूरिस्ट रिसेप्सन सेंटर) पर पहुंचा,वहां कई सारे एजेंट मेरे सामने प्रगट हो गए.होटल बुकिंग के लिए प्रार्थना-सी करते दिखे.बड़े अच्छे लोग हैं श्रीनगर के .मैंने साफ़ कह दिया कि भाई मुझे तो ३००-४०० रुपये में होटल चाहिए.ऐसा सुनते ही ज्यादा तर एजेंट लोग साफ़ हो गए,क्यों कि इतना तो होटल का ही बनता फिर उन्हें दलाली में क्या मिलता-कद्दू? एक बूढ़ा- सा व्यक्ति मेरे सामने रुका ,उस ने कहा-"क्या आप मेरे गेस्ट हाउस रहना चाहेंगे.वह मेरे घर में ही है.हम भी वह रहते हैं.हम घर का खाना भी बना कर देंगे."घर के नाम पर मुझे थोड़ी सी अलग सी बात लगी खैर मेरी पत्नी कि सहमती पर मैंने सोचा कि कमरा देखने में तो कोई बुराई  नहीं है.पसंद आएगा तो रह लेंगे नहीं तो कहीं और देखेंगे.बहरहाल कमरा बहुत अच्छा लगा और मात्र ३००/- में ही तय हो गया.कहने का मतलब है कि डल झील के आस पास आप को बहुत बढ़िया और बजट वाले होटल्स आराम में मिल जायेंगे जिन के रेट्स अप्रेल-अक्तूबर तक के पीक सीजन में लगभग 800 -1000 रुपये और ऑफ़ सीजन(नवम्बर-मार्च) में 300-600 रुपये में पड़ सकता है
.इस के लिए जैसे ही आप T.R.C. पर उतरतें हैं,होटल्स के एजेंट्स आप को घेर लेंगे,आप बिना शर्माए अपना बजट बता दीजिये अगर आप दिखाबे के चक्कर में पड़े तो आप को चुना लगने में देर नहीं करेंगे.और हाँ वहां के लोग इज्जत पसंद हैं इसलिए तमीज से बात करना न भूलें.अगर आप सरकारी होटल्स में रुकना पसंद करें तो T.R.C की बगल में ही सरकारी होटल है जिस में आप बात कर सकतें हैं.सौदेबाजी वहां भी चलती है इसलिए यह सोचना बेकार होगा कि सरकारी है तो फिक्स दाम होगा ही.आप अपनी सौदे बाजी(Bargaining)  की आदत से कभी बाज नहीं आना,क्यों की यही आदत आप की सुरक्षा कवच का काम करेगी.और आप की जेब को सुरक्षित रखेगी.से यात्रा जितनी सुरक्षित हो उतना ही मजा बढ़ जाता है उस पर भी सस्ती हो तो क्या बात है.मेरा मतलब है की अगर आप हनीमून पर जा रहें हैं तो जो मजा यहाँ श्रीनगर में है उतना मजा शायद कहीं नहीं.सर्दी इतनी होती है जनाब कि मोहतर्मा को आपके गले से लिपटना ही पड़ेगा.बस आपको उन्हें शानदार शोपिंग कराना नहीं भूलना है.और भाई इस लिए जो आप बजट होटल्स और बस यात्रा कर के माइनस करेंगे वह आप अपनी 'उन' के लिए शोपिंग में लगा दीजिये.बचने नहीं दूंगा भाई,अगर आप सोच रहें हों तो.होटल तो हो गया.
आइये अब खाने-पीने की बात करतें हैं,दरअसल मैं शाकाहारी हूँ इस लिए केवल उसी विषय मैं बता सकूँगा,मांसाहारी मुझे क्षमा करेंगे.अगर आप डल गेट के आस पास ठहरें हैं तो आप को बहुत सारे भोजनालय/ढाबे मिल जायेंगे.यहाँ ज्यादातर लोग रेस्टोरेंट को ढाबा ही बुलातें हैं,तो सब से शान दार और स्वादिष्ट खाना बनाने वाले दो ढाबे पसंद आये- १. कृष्णा ढाबा २. वैष्णो ढाबा .ये दोनों ही अगल बगल हैं.T.R.C. या डल गेट के आस पास किसी से भी पूंछने पर आप को इन तक पहुँचाने मैं देर नहीं लगेगी.

तीसरा मैं चाहूँगा कि आप यूँ तो अपनी सुविधानुसार बस या ऑटो या टेक्सी किसी मैं भी सफ़र कर सकतें हैं.मगर मैं यहाँ कहना चाहूँगा कि यहाँ की बसों में आप अपने परिवार के साथ बड़े ही अदब के साथ सफ़र कर सकतें हैं.कश्मीरी संस्कृति आज  भी इतनी महान है कि वहां के लोग टूरिस्ट्स का दिल से सम्मान करतें हैं,जहाँ आज  कल ज्यादा तर टूरिस्ट प्लेस वहां के लोगों कि शरारतों की बजह से बदनाम हैं,श्रीनगर में आप को यह शिकायत बिलकुल नहीं मिलेगी.वहां आप देर सबेर भी बाजार या बागों में घूम सकतें हैं.श्रीनगर के आस पास के दर्शनीय स्थलों के लिए आप बस से जा सकतें हैं,इस के लिए आप को एक दिन पहले ही या सुबह 8 बजे तक T.R.C पहुँच कर टिकट बुक करनी होंगी.इन बसों में आप के जैसे टूरिस्ट लोग ही होंगे जिन के साथ आप खुद को बड़ा ही अच्छा महसूस करेंगे.कहने का मतलब आप अपनी मेम साब के साथ हंसी ठिठोली  कर सकतें हैं,शर्माने की कोई जरुरत नहीं है.हो सकता है आप शर्मायें तो वहां का माहौल  ख़राब हो सकता है.मतलब कि बस में भी आप पूरा मजा सुरक्षित रूप से उठा सकतें हैं.
        गुलमर्ग या सोनमर्ग जाते वक़्त आप को गर्म कपडे पहन कर जाना होगा,क्यों कि यहाँ सामान्य तौर पर बहुत ठण्ड होती है.मगर चिंता कि कोई बात नहीं आप गलेंगे नहीं,जो गरम कपडे आप ले के जायेंगे उस से आराम से आप का काम हो जाना चाहिए.मगर फिर भी आप सुविधानुसार गर्म कपडे पहन लें तो बेहतर होगा.बर्फ में चलने के लिए बड़े जूतों यानि कि बूटों की जरुरत पड़ती है,जिस के लिए बस चालक आप को गुलमर्ग से 13 Km पहले ही तंगमार्ग में अपनी कमीशन वाली दूकान के सामने खड़ा कर देगा.जहाँ से ज्यादा तर टूरिस्ट्स को 100-200 रुपयें जोड़ी किराये पर बूट मिलतें हैं.मगर आप चूँकि मेरा ब्लॉग पढ़ रहें हैं ,तो आप को बताना ही पड़ेगा की गुलमर्ग में मात्र 20-50 रुपये जोड़ी में ही मिल जातें हैं.गुलमर्ग में गोंडोला का लुत्फ़ लेना मत भूलियेगा.
             याद  रखिये - बारगेनिंग करना

           मैं चाहूँगा कि अगर आप श्रीनगर जाएँ तो आप को अपने हिसाब से रहने -घुमने  में कोई परेशानी न हो.हो सकता है मेरा ये नुभव आप के काम आये.अगर मेरा अनुभव आप के जरा सा भी काम आया.तो में खुद को भाग्यशाली समझूंगा.
महत्त्वपूर्ण पते -ठिकाने-
1. होम हॉउस- यह एक घर जैसा ही गेस्ट हॉउस है जहाँ आप को घर जैसी फीलिंग होगी.यहाँ की रूम सर्विस बहुत ही फास्ट है और मेहमान नवाजी को देखते हुए,आप को यहाँ बहुत मजा आएगा.रूम्स बहुत साफ़ सुथरे हैं गीजर लगे हुए हैं.२४ घंटे बिजली,पानी की व्यवस्था.जैसे ही आप श्रीनगर की यात्रा से लौटेंगे होम हॉउस  के सदस्य आप का गरमा-गरम चाय कहवा के साथ स्वागत करेंगे.आप जाइये और खुद देखिये?
पता-H.No.4,Modern Hospital Road,Opp. Child Care School,Zero Bridge,Raj Bagh
Phone-9906580545/9796517362 ( Abdul Hamid )
2.भोजनालय- कृष्णा /वैष्णो ढावा , दुर्गानाग मंदिर ,TRC से १/२ किमी की दूरी पर ,श्रीनगर.


3. सही दाम पर शॉल,जाकेट जैसी कश्मीरी यादों के लिए आप जा सकते हैं-
   Gh-Qadir & Sons-Aram-wari,zero Bridge,Modern Hospital Road.
       (no bargaining here)
४. इस बार श्रीनगर में मैंने एक और ठिकाना ढूढ़ा।  जहाँ  मुझे बहुत मजा आया। इस का पता निम्नलिखित है
          इस्कॉन मंदिर (श्री  राधा  कृष्ण मंदिर )
श्री कठलेश्वर महादेव ,
टाँकीपोरा, D.C. ऑफिस के पास , 
हब्बा कदल , जहांगीर चौक श्रीनगर।
       यहाँ बहुत साफ़ और सुन्दर रूम्स उपलब्ध हैं.जहाँ  सुबह -शाम का सात्विक भोजन  उपलब्ध रहेगा। यहाँ आपको होटल जैसा तो नहीं मगर घर जैसा आनंद जरूर मिलेगा. यहाँ के प्रतिदिन के चार्जेज बहुत ही कम हैं (500-700 Rs भोजन सहित ).लेकिन यहाँ  के नियमों का पालन करना अनिवार्य है. जिसके बारे में वहां जानकारी दे दी जाती है. मेरी व्यक्तिगत राय में आप यहाँ बहुत में रहेंगे.

आप की प्रतिक्रियाएं ,मेरे लेखन को बेहतर बनातीं हैं .इस लिए लिखते रहिये .
भड़ांस निकालते रहिये.

रविवार, 25 मार्च 2012

चलिए आप को श्रीनगर लिए चलतें हैं-1

    यह साल (२०१२)मेरे लिए और मेरे  खान- दान के लिए बड़ा ही विशेष था.क्योंकि इस वर्ष ही मुझे और मेरी पत्नी को श्रीनगर जाने का मौका मिला.नहीं तो मेरी पिछली तीन पीढ़ियों ने उत्तर प्रदेश से तो क्या अलीगढ से आगे निकल कर नहीं देखा.भाई किस को फुर्सत है खेती-बाड़ी  से?मगर मैंने तो सोच लिया था कि भैया चाहें कुछ भी हो घूमना-घुमाना जरुर करूँगा चाहें थोडा-बहुत कम बचत करनी पड़े.क्योंकि ज़नाब गाफिल ने क्या खूब कहा है-"सैर कर दुनिया कि गाफिल जिंदगानी फिर कहाँ / जिंदगानी  गर रही तो नौ-जवानी फिर कहाँ?"
 जैसा कि मैंने कहा कि यह साल मेरे  लिए बड़ा ही विशेष रहा,कई रिकॉर्ड टूटे मेरे खान दान के -
पहला रिकॉर्ड -मै और मेरे  परिवार ने एयर-इंडिया से हवाई यात्रा की.आज कल अगर कोई आम आदमी एयर-इंडिया से हवाई यात्रा कर ले ये ही अपने आप में रिकॉर्ड बन जाता है.हांलांकि सरकारी अफसरों की बीबियाँ अपने पति के ऊपर जबरदस्ती दबाव डाल कर उनका और अपने परिवार का रिजर्वेसन एयर-इंडिया में ही करवातीं हैं क्यों कि उनको लगता है कि एयर इंडिया की यात्रा उन के पति के लिए सुरक्षित है.क्यों कि एयर इंडिया कि एयर होस्टेस अधेड़, साड़ी-शुदा और शादी-शुदा होती हैं.जिस से उन के पति खुद ही  तांक-झांक नहीं करतें हैं.अन्यथा किंगफिशर  जैसी एयर-लाइंस में तो साधू-संत भी चक्षु-शेकन करना आरम्भ कर देतें हैं.आम आदमी तो फिर भी अबला नारी का शिकारी होता ही  है.
     और फिर एयर इंडिया में सफ़र करना इतना महंगा है कि आम आदमी तो अपनी बीबी को समझा लेता है कि -"तुम ऐसा करो प्रिये! कि एक किलो चावल-दाल मिक्स कर लो.मैं फ्लाईट मैं दोनों को अलग करता रहूँगा.इस से पैसे भी बच जायेंगे और मैं उन किंगफिशर की अप्सराओं की ओर मेरा ध्यान भी नहीं जायेगा."


        दूसरा रिकॉर्ड यह टुटा कि मैं उस उत्तर प्रदेश कि सीमा से बाहर निकला,जिस उत्तर प्रदेश मैं हाथी भी मूर्ति बन के चुप-चाप पार्कों में खड़ा रहता है.सरकारी उच्चा अधिकारी भी बहन जी के सामने दम हिलाते नज़र आतें हैं .तो बेचारा आम आदमी क्या करेगा?जिस उत्तर प्रदेश में दलितों को मात्र वोट-बैंक की दृष्टि से ही देखा जाता है.जिन्हें जीवन पर्यंत दलित जीवन की सीमाओं में बंधे रहने के लिए अप्रत्यक्ष रूप से बाधित किया जाता है.क्यों कि चाहें वे कितने भी बड़े बन जाएँ,मगर politician  अपने फायदे के लिए उन्हें दलित ही बना कर रखतें हैं .फिर क्या फर्क पड़ता है कि आप कि आर्थिक स्थिति कितनी सुद्रढ़ है जब तक कि आप को दलित ही कहा जा रहा है.दलित शब्द का अर्थ है-"प्रताड़ित/पीडित/शोषित".मगर क्या कोई व्यक्ति तब भी शोषित रहता है जब वह उच्च सरकारी सेवाओं पर नियुक्त हो जाता है.जहाँ उसे अपनी सात पीढ़ियों तक को पालने पैसा मिल जाता है.मगर वह भी अपने बच्चों को दलित कहलवाना ही पसंद करता है -चंद आरक्षण सम्बन्धी लाभों के लिए.जिस अभिशाप से बचाने के लिए संविधान में दलित-भलाई कार्यक्रमों का प्रावधान गुनी-जनों ने किया था वे सब निरर्थक ही सिद्ध होतें है क्यों कि आज तक दलित का बेटा या उसके बेटे का बेटा दलित ही रहा है.उस का ओहदा बढ़ सकता है ,उस कि आर्थिक स्थिति मजबूत हो सकती है मगर उस कि सामाजिक स्थिति मैं कोई बदलाब नहीं आता.वह अपनी आगामी पीढ़ियों को भी जन्मजात  दलित घोषित कर देता है.क्यों कि  दलित बने रहेंगे तो ही आरक्षण भी मिलाता रहेगा.फिर कोई क्यों अपनी स्थिति में सुधार लाये.
                       मैंने उस उत्तर प्रदेश की सीमायें पार की जिस की सीमाएं सिर्फ बाहरी प्रदेशों में काम पानें और अपना पेट भरने के लिए ही पार की जाती हैं .ना कि घुमक्कड़ी का शौक पूरा करने के लिए.जहाँ के लोग आज भी पुलिस थाने में रिपोर्ट दर्ज करने के ५०० रुपये देतें हैं.जहाँ कि पुलिस पैसे ले कर भी ,कब ताकतवर पार्टी के साथ मिल जाये कोई भरोसा नहीं,जहाँ गरीबों के लिए आने वाला मिटटी का तेल भी उन के घरों को फूंकने के काम में लिया जाता है.जहाँ की शासन व्यवस्था को आज तक कोई चाणक्य नहीं मिला,न कोई चन्द्रगुप्त.जो भी शासक बना उसने सिर्फ अपनी और अपनी जाति कि भलाई के बारे में ही सोचा.किसी ने अपने गाँव के लिए रन-वे बनवा दिया तो किसी ने हेली-पैड.किसी ने हाथी की मूर्ति लगवा दी तो किसी ने गधे की.समझ नहीं आता कि इन के पास इन हाथियों-गधों से मिलने कि फुर्सत खूब मिलती हैं मगर इंसानों  कि याद सिर्फ चुनाव से पहले ही आती है.
               मजाक-मजाक में बहुत भंडास निकाल ली ,क्या करें  इन राज नेताओं ने अपने विशेष* कर्मों से लेखकों को इतना मसाला प्रदान कर दिया कि जितना भी गरियाओ,न तो मसाला ख़त्म होता है न भंडास.खैर मैंने श्रीनगर जाने के लिए लिए लगभग दो महीने पहले से तयारी शुरू कर दी थी.होटल्स कि तलाश ओन लाइन कि तो ससुरा सब से सस्ता होटल मिला तो 1455 /- का.अब वहां जाना था तो रहना ही पड़ेगा.इस लिए एक दिन के लिए वाही होटल बुक कर दिया.हांलांकि 6 दिन रहना था मगर होटल एक दिन के लिए बुक किया.यह सोच कर कि हो सकता है कि डैरेक्ट होटल बुक करें तो शायद कुछ रियायत मिल जाये.मगर जब में वहां पहुंचा तो इन ऑन-लाइन होटल बुकिंग की असली पोल खुली.भैया जितने भी टूरिस्ट एरिया के जो होटल वालें  हैं ससुरे बहुत ही चालू पुर्जे वाले हैं.इन का कोई हिसाब- किताब नहीं है.जैसी मुर्गी फंस जाये,वैसा ही बटोर लो.क्यों कि ज्यादा तर तो वहां हनी-मून मनाने ही जातें हैं इसीलिए नई बीबी को  इम्प्रेस करने के चक्कर में ससुरे खूब खर्चा करतें हैं.खूब महंगे होटल में रुकतें हैं .अब एक बात बताइए आप हनी-मून बीबी के साथ मनाएंगे या होटल के साथ.खैर सौ बातों की एक बात कि भैया अगर पैसा मेहनत का हो तो खर्च किया जाता है,और हराम का हो तो उड़ाया जाता है.मालुम नहीं कि मेहनतकश लोग पैसा उड़ाने की बात क्यों करतें हैं.अगर उड़ना ही था तो इतनी मेहनत क्यों?

दुष्ट व्यक्ति यदि आपको सम्मान भी दे तो सावधान

समाज में दो प्रकार के मनुष्य सदा से ही पाए जाते रहें हैं – सज्जन और असज्जन | अलग अलग युगों में हम उन्हें विभिन्न नामों से पुकारते रहें ...